झूठ के पैर

आनंद त्रिपाठी

झूठ के पैर
नहीं होते,
मगर दौड़ता है वह,
हवा के घोड़े पर सवार होकरl
चीखता है इतना कर्कश
कि सुनते हैं लोग उसे,
कान खड़ा करके
कभी मजबूरन,
कभी निंदारस के चटखारे के साथl
वह दीखता है दशशीश
अपनी बीसों भुजाओं के साथ
सच को रौंदता हुआ साl
मेलों और प्रदर्शनियों में टंगे
विभिन्न आकृतियों के फुले गुब्बारों सा,
वह दूर से ही नजर आ जाता है
दूर्वासा की तरह
औरो से अलग l
वह रचता है स्वांग
किसिम किसिम के
अपने कूटरचित झूठ को
सच मनवाने की जिद में l
वह करता है
मनुहार, पुचकार, फुफकार, दहाड़, रुदन
इतनी कि उसके घटाटोप में
कभी दिखता है, सच भी तिमिराच्छन्नl
मगर समय सापेक्ष होता है झूठ
उसकी उम्र होती है बस उतनी,
जबतक सच का सूर्य चमक नहीं जाता
अपने तीक्ष्ण तेवरों के साथ
क्षितिज के भाल पर l

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